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Wednesday, October 25, 2017

एकता में अनेकता का प्रतिक है छठ पूजा

दिल्ली के यमुना तट से, कोलकाता के बाबूघाट, मुम्बई के जुहू बीच तक, उत्तर प्रदेश के बनारस घाट, भोपाल के ताल से लेकर लुधियाना के नहरों तक यदि छठ माई के गीत गूँज रहे हैं, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहाँ बिहार पहूँच गया है, इसलिए कि छठ मात्र बिहार की धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं , यह प्रतीक है एक आम भारतीय के जीवन का, उसकी जीवन दृष्टि का, जिसमें शायद किसी के लिए भी असहमति की गुँजाइश नहीं बनती। छठ पूजा शायद एकमात्र ऐसा उत्सव है जिसमे आम भारतीय जीवन को अपनी संपूर्णता मे अभिव्यक्ति मिलती है। यह किसी जाती या धर्म को नहीं मानता, इसलिए कहा जाता है कि इस लोकोत्सव मे सबों की समान भागीदारी होती है। एक समुदाय से सूप आते हैं , तो एक समुदाय से मिट्टी के बर्तन, मौसमी फलों की आपूर्ति मुस्लिमों के द्वारा ही की जाती है। लाल रूई से लेकर कपूर तक और सिंधा नमक से लेकर सिन्दूर तक छठ व्रत में लगभग सौ से भी अधिक सामाग्री लगती है। छठ पूजा ही शायद एक ऐसा पर्व है जिसे मनाने के लिए न तो किसी मंदिर की जरूरत होती है, न किसी पण्डित की और न ही किसी प्रतीमा की। ईश्वर और आस्था के बीच सीधे संवाद का है यह व्रत।
दिपावली, दशहरा और होली की तरह किसी की हार, किसी की जीत का पर्व नहीं है। इसमें भारतीय जीवन दृष्टि को अभिव्यक्ति मिलती है। छठ पूजा कि सरलता इसी से समझी जा सकती है की इसकी शुरुआत कद्दू-भात से होती है, दूसरे दिन रोटी और खीर प्रसाद के रूप मे खायी जाती है। कोई आडंबर नहीं बदन पर सिर्फ सूती धोती, साड़ी जिसे पहनकर आप कमर भर पानी मे खड़े होकर सूर्य भगवान को अरध दे सकें। गांव, टोला, शहर व गली चारों ओर इस पर्व की सशक्त आहट दिवाली के बाद से हीं मिलने लगती है। गीत-संगीत के माध्यम से भी इस पर्व की महानता की छौंक लगाने मे बिहारी कलाकार चार चांद लगा रहें होते हैं।

छठ पूजा साल मे दो बार मनाई जाती है, पहला कार्तिक महीने में, दूसरा चैत महीने में, कहा जाता है की चैत छठ बड़ी माँ होती है और कार्तिक छठ छोटी माँ। अब तो छठ पूजा मे पूरे देश के लोगों का आस्था देखने को मिल रहा है तभी तो बंगाल सरकार व दिल्ली राज्य सरकार ने इस अवसर पर छुट्टी की घोषणा करती है।

पारस कुमार सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष - मगही मगध नागरिक संघ

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