झारखंड

कविता कभी निष्प्राण नहीं हो सकती : रणधीर चन्द्र गोस्वामी

राष्ट्रीय कवि संगम, बोकारो इकाई की मासिक कवि गोष्ठी आयोजित

बोकारो: राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक संस्था राष्ट्रीय कवि संगम की बोकारो महानगर इकाई की मासिक काव्य गोष्ठी सेक्टर 4 एफ में आयोजित हुई। राष्ट्रीय कवि संगम, बोकारो महानगर इकाई के अध्यक्ष अरुण पाठक की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य गोष्ठी में फुसरो से पधारे संस्था के प्रांतीय संगठन मंत्री डॉ श्याम कुंवर भारती, धनबाद से पधारे अनंत महेन्द्र, सरंक्षक लाखन सिंह, बोकारो जिला इकाई संयोजक सुनील कुमार सिंह, बोकारो महानगर इकाई के महासचिव ब्रजेश पांडेय सहित डॉ परमेश्वर भारती, रणधीर चंद्र गोस्वामी, भावना वर्मा, उषा झा, डॉ रंजना श्रीवास्तव, अमन कुमार झा, डॉ नरेन्द्र कुमार राय, समीर स्वरुप गर्ग, कुमार केशवेन्द्र, अभिनव शंकर, रवीन्द्र कुमार रवि, नितेश सागर, जाहिद सूफी ने देशप्रेम व मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत कविता, गीत-गज़ल सुनाकर अपनी रचनाधर्मिता से सबको प्रभावित किया।
काव्यगोष्ठी की शुरुआत कवयित्री भावना वर्मा ने गीत ‘भोर मन्दिर क्यों दीप जलाएं…’ सुनाकर की। तत्पश्चात् उषा झा ने ‘बुला राह नव विहान है’, डॉ रंजना श्रीवास्तव ने ‘आदमी तो माटी है माटी में मिल जाएगा’, ब्रजेश पांडेय ने ‘जिंदगी या सितम’, अमन कुमार झा ने मैथिली कविता इठलाइत अगराईत मैथिली’, डॉ नरेन्द्र कुमार राय ने ‘यह आंचल भारत मां का अनुपम है स्वर्ग धरा का’, डॉ परमेश्वर भारती ने ‘बरसो बदरिया हमरे गांव में…’, डॉ श्याम कुंवर भारती ने ‘अब शक्ति भर दो’, अभिनव शंकर ने ‘नक्सलवाद’, कुमार केशवेन्द्र ने ‘वर ऐसा हो’, अमन कुमार मिश्रा ने ‘सपनों को ढलते देखा है’, जाहिद सूफी ने ‘पिता’, रणधीर चंद्र गोस्वामी ने ‘मां’, समीर स्वरुप गर्ग, सुनील कुमार सिंह ने हिन्दी कविता, लाखन सिंह ने भोजपुरी गीत, अनंत महेन्द्र, नितेश सागर, रवीन्द्र कुमार रवि ने गज़ल व अरुण पाठक ने मैथिली में भगवती वंदना सुनाकर सबकी प्रशंसा पायी। काव्यगोष्ठी का संचालन कुमार केशवेन्द्र ने किया। काव्यगोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ कवि रणधीर चंद्र गोस्वामी ने कहा कि कवि गोष्ठी में उपस्थित युवा पीढ़ी की संख्या और उनकी रचनाओं को सुनकर उन्हें काफी प्रसन्नता हुई है। साहित्य के प्रति युवा पीढ़ी का यह रुझान इस बात का प्रमाण है कि कविता कभी निष्प्राण नहीं हो सकती। साहित्यकार डॉ परमेश्वर भारती ने कहा कि राष्ट्रीय कवि संगम का यह प्रयास प्रशंसनीय व अनुकरणीय है।

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