फ़िल्म समीक्षा

2019 अ डिफरेंट लव स्टोरी, “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा”

FILM REVIEW - एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

anu newatia
समीक्षक – अनु नेवटिया

“विकृतिः एवम् प्रकृति”- ऋग्वेद
अर्थात जो अस्वाभाविक लगता है वह भी स्वाभाविक है।
और इसी स्वाभाविकता को सहज अंगीकरण प्रदान करने का एक खूबसूरत प्रयास है फिल्म “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा”
फॉक्स स्टार स्टूडियोज के बैनर तले एक फरवरी 2019 को रिलीज़ हुई निर्माता विनोद चोपड़ा की यह फिल्म एक ऐसी ही अस्वाभाविक प्रेम कहानी है जिसे सरकारी मान्यता भले ही मिली हो पर आम इंसान की सोच से अब भी परे है ।
अगर विषय की बात करें तो समलैंगिकता विदेशों में ही नहीं भारत में भी प्राचीन काल से है। ‘कामसूत्र’ ‘अर्थशास्त्र’ और मुग़ल शासन में इसका ज़िक्र मिलता है, तो इसे पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित तो बिलकुल नहीं कह सकते।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह न कोई बीमारी है और ना ही शौक! प्रकृति ने ही कुछ इंसान ऐसे पैदा किए हैं जो बचपन से ही समलैंगिकता की तरफ आकर्षित होते हैं।
बहुत संघर्षों बाद विदेशों में भले ही इसे सामान्य माना जाने लगा पर भारत में आज भी समलैंगिकता किसी घिनोने अपराध से कम नहीं। भारत संस्कृति और परम्पराओं का देश है, तो कुछ भी ऐसा जो बिलकुल ही सभ्यता के खिलाफ हो, उसे स्वीकार करना इतना सहज भी नहीं। विचार मॉडर्न हो रहे हैं पर इतना बोल्ड होने में अभी वक़्त लगेगा।
ऐसे में एक समलैंगिक व्यक्ति किस तरह से खुदसे और समाज से लड़ता है, किन भावनाओं से गुज़रता है, अकेलेपन और कुंठा से ग्रसित होता है, एक सामान्य व्यक्ति इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकता।
LGBT थ्योरी (जो 1990 से प्रचलित है) पर पहले भी कई पिक्चरें बनी है, पर अधिकतर या तो क्रिटिक्स के लिस्ट में ही रह गयी या हास्य की तरह पेश की गयी ।ऐसे में सोनम कपूर, अनिल कपूर, राजकुमार राव जैसे बड़े सितारों का इस मुद्दे पर आधारित फिल्म करना वाकई सराहनीय है। क्यूंकि एक फिल्म दिमाग पर जितना गहरा प्रभाव छोड़ती है, शायद समलैंगिकता पर लोगों का नजरिया थोड़ा बदले ।
फिल्म की बात करें तो एक्सीडेंटल पीएम, बाल ठाकरे जैसी राजनितिक फिल्मों की लहर के बीच एक असरल विषय पर सरल सी कहानी उन राजनितिक दंगल से राहत प्रदान करती है । कहानीकार ग़ज़ल धालीवाल और शैली चोपड़ा ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है की फिल्म की कहानी ना तो मुद्दे से भटके और ना ही दर्शकों को उबाऊ लगे। ये कहानी है पंजाब के गाँव ‘मोगा’ में रहने वाली एक लड़की की जिसकी शादी के लिए उसके परिवार वाले लड़का ढूंढ रहे हैं। इसी बीच एक लेखक को उस लड़की से प्यार हो जाता है पर कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब उस लेखक को पता चलता है की वो लड़की आम लड़कियों से अलग है, उसे लड़के नहीं लडकियां पसंद है।
तो इसके आगे कहानी कैसा मोड़ लेती है, वह लेखक क्या करता है, समाज और उसके परिवार की इस पर क्या प्रतिक्रिया होती है, इन्हीं सब घटनाओं के उतार चढाव की कहानी है “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा”।
अभिनय की बात करें तो अनिल कपूर का जलवा आज भी परदे पर वैसा ही है। जितनी मस्ती में उन्होंने एक ज़िंदादिल पंजाबी का किरदार निभाया है उतनी ही कशिश बिखेरी है एक बेबस बाप की स्थिति को दर्शाने में। सोनम कपूर ने एक समलैंगिक के मन की स्थिति को बड़े आत्मीयता से पेश किया है। राज कुमार राव वो स्तम्भ हैं जिन्होंने पूरी फिल्म को संभाले रखा। जूही चावला के किरदार में एक स्पार्क है,उनकी मौजूदगी दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरती है।
एक सीनियर आर्टिस्ट और सपोर्टिंग कलाकार फिल्म के लिए कितने महत्वपूर्ण है ये सीमा पाहवा, बृजेंद्र काला जैसे कलाकारों के अभिनय से पता चलता है। अभिषेक दुहान और रेजिना कैसैंड्रा ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है।
जहाँ एक ओर विषय, अभिनय, कहानी और निर्देशन लाजवाब हैं, वहीँ दूसरी ओर फिल्म के गानों में कोई ख़ास दम नहीं है, ना ही एंटरटेन करने के लिए एक्स्ट्रा एफर्ट डाला गया है। संवाद में भी कहीं कहीं सुधार की गुंजाइश दिखती है। तो शायद आपको फिल्म बहुत मज़ेदार न लगे पर विषय के साथ पूरा न्याय किया गया है और जिस सन्देश को लोगों तक पहुंचाने के मक़सद से फिल्म बनायी गयी है, उसमें कामयाबी मिली है।
सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग काबिल ऐ तारीफ है। कहीं से भी कुछ भी बनावटी नहीं लगेगा। आप कहानी के साथ जुड़ पाएंगे, और इस रहस्यमयी, संकोची मुद्दे को अलग नज़रिये से देख पाएंगे।
समलैंगिगता को आप पसंद न करें पर कम से कम स्वीकार कर लें कि यह एब्नॉर्मल नहीं प्राकृतिक है, यही इस पिक्चर का मुख्य उद्देश्य है।
एवरेज रेटिंग इसे ५ में से ३.५ से लेकर ४ तक मिली है, पर ये कितना कमाए या कितनी वाह वाही बटोरे इसे ज़्यादा मायने रखता है ऐसे सामाजिक मुद्दों के बारे में लोगों को जागरूक करने का जोखिम उठाना जिसके लिए इसे पुरे अंक मिलने चाहिए।
2019 की इस न्यू एज्ड लव स्टोरी का नाम 1994 में आयी फिल्म’1942 अ लव स्टोरी’ के गाने पर रखा गया है ओर मजे की बात यह है कि इससे बेहतर फिल्म का नाम हो भी नहीं सकता था। “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा”

— अनु नेवटिया —
–हावड़ा, पश्चिम बंगाल —
–9163479944 —

Show More

One Comment

  1. बेहतरीन समिक्षा । इस विषय पर पहले बनी फिल्मों (फायर , गर्लफ्रैंड) से ये फिल्म अलग है । दोस्ताना में एक मजबूत विषय का मजाक बना कर रख दिया गया था । लेकिन ये फिल्म थोड़ी आस जगाती है । हो सकता है इससे हमारा नजरिया थोड़ा बदले ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close
Close

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker