पश्चिम बंगाल

सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज में ‘पाली और आज’ विषय पर सेमिनार

सेमिनार में हिन्दी आनर्स के तीन विद्यार्थियों ने आलेख पाठ किया

कोलकाता: सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज, कोलकाता के हिन्दी विभाग ने ‘पाली और आज’ विषय पर विद्यार्थी सेमिनार का आयोजन केमिस्ट्री गैलरी में किया।
कॉलेज की टीचर इन चार्ज डॉ सुप्ति साहा राय ने सेमिनार का उद्घाटन करते हुए हिन्दी विभाग के आयोजन की सराहना की।
इस सेमिनार में हिन्दी आनर्स के तीन विद्यार्थियों ने आलेख पाठ किया। हिन्दी आनर्स के प्रथम वर्ष के छात्र सनी कहार ने ‘पाली का भारत’ विषय पर आलेख पाठ करते हुए कहा कि भीष्म साहनी की कहानी ‘पाली’ देश के विभाजन पर लिखी गयी मार्मिक और अविस्मरणीय कहानी है। देश के विभाजन की भयंकर त्रासदी के समय हजारों शरणार्थियों के साथ चार वर्ष का बालक पाली भी अपने परिवार के साथ मंजिल की तलाश कर रहा था। भीष्म साहनी लिखते हैं -कौन जानता है कि स्थितियाँ निर्णायक होती हैं या मनुष्य स्वयं निर्णायक होता है या भाग्य निर्णायक होता है। पाली कहानी का संदेश है -मनुष्य को सबसे पहले मनुष्य की तरह देखना चाहिए, धर्म मनुष्य को बाँट देता है।
सुशांत केशरी ने ‘पाली का धर्म और आज’ विषय पर आलेख पाठ किया। सुशांत केशरी ने कहा कि भीष्म साहनी ने इस कहानी में उस इंसानी रिश्ते को महत्व दिया है जो धर्म, संप्रदाय, वर्ग और वर्ण की दीवारें लाँघकर आदमी और आदमी के बीच एकात्म कायम करता है। कहानी में विभाजन की त्रासदी के बीच मानवीय संवेदना की तलाश लेखक ने की है। लेखक ने यहाँ उस माँ की ममता को दर्शाया है जो पाली को धर्म के चश्मे से न देखकर उसे ममता की भावना से देखती है।
सेमिनार की अध्यक्ष हिन्दी आनर्स के प्रथम वर्ष की छात्रा सुभनिका दास ने कहा कि भीष्म साहनी ने पाली में लिखा है “बात कभी खत्म नहीं होती, लोग केवल इस आस में जीते हैं कि वह खत्म हो चुकी है, परंतु वह कभी खत्म नहीं होती, जिन्दगी का छोर कभी एक दूसरे से नहीं मिलता है, जिन्दगी की गति कभी थमती नहीं। वह हमेशा चलती रहती है और हर मोड़ पर अपना प्रश्नचिन्ह हमारी आँखों के सामने छोड़ जाती है। पाली कहानी को पढ़ते हुए पाठक के मन में लगातार प्रश्न उठते रहते हैं। देश की आजादी में विभाजन की त्रासदी क्यों? पाली को बार बार धर्म का शिकार क्यों बनाया जाता है। इसी विभाजन ने पाली के बचपन को दो भागों में बाँट दिया है विभाजन के दर्द को लेखक ने व्यक्त किया है -बँटवारे के समय का जुनून बहुत कुछ ठंडा पड़ चुका था, पर उसका बचा खुचा प्रभाव अभी भी लोगों के जेहनों से मिटा नहीं है।
प्रो. श्रेया जायसवाल, प्रो अशोक कुमार सिंह ने सेमिनार का संचालन और प्रो. सीमा सिंह ने आभार व्यक्त किया।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close
Close

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker